Salvation after Social Media


आज हर स्मार्टफोन उपयोगकर्ता अपने आप में व्यस्त है। जाने-अनजाने में सोशल मीडिया उनको धीरे-धीरे अनसोशल बना रही है। पिछले दो दशकों तक एक प्रभावी परम्परागत सामाजिक व्यवस्था होने के कारण सामान्य लोगों के जीवन में कोई ज्यादा शोध का विषय नही होता था। विकल्पों पर आधारित ख़ुशी को लोग धर्म से जोड़कर देखते थे। उम्र के अंतिम पड़ाव पर लोग ये सोचना शुरू करते थे कि कुछ दशकों के जीवन में उन्हें क्या कुछ नया हासिल करना था और कितना हो पाया। जरूरतों के उलझन में उन्हें सभी कुछ बिकाऊ ही नज़र आता था।

आजकल जिन्दगी की भाग-दौड़ कम हो या ना हो पर अब इसकी दिशा जरूर बदल चुकी है। फ्री-इंटरनेट चैनलस अब समय के प्रबंधन और आकलन की ट्रेनिंग दिला रहे हैं। जिससे ये निर्धारित करना आसान हो जाएगा कि वर्तमान समय से लेकर इस धरती पर बिताये अपने जीवन के आख़िरी क्षण तक हमें क्या कुछ नया करके जाना है।

Image

Nowadays, every smart phone user is busy on its own. Unknowingly, social media is making them more unsocial with time. Till last two decades ago, due to the very influencing traditional society, there was not much subject of research in the lives of ordinary people. People used to associate happiness with choices based on religion. At the last phase of the age, people used to start thinking about what they had to achieve and how much they have achieved in last few decades. Perplexed by the need based life, people used to see everything in terms of money.  

Nowadays life's run-off may or may not be reduced, but now its direction has changed for sure.  Free-Internet channels are now providing training in time management and estimation. Which will make it easy to determine what we have to go through from the present to the last moment of our life spent on this earth.


सुदेश कुमार
@sudeshkumar

No comments:

Post a Comment